December 3, 2022

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जेनेरिक या ब्रांडेड कौन सी दवा है बेहतर ?| Which medicine is better generic or branded in Hindi?

Which medicine is better generic or branded in Hindi?
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दोस्तों पोस्ट में देरी के लिए माफी चाहती हूँ, तबीयत खराब होने की वजह से थोड़ी देरी हुई, और मैंने दवाइयाँ भी खाईं और तभी दवाइयों से मुझे याद आया की कौन सी दवा मुझे ठीक करने के लिए बेहतर होगी जेनेरिक या ब्रांडेड। आप सबने सुना ही होगा की दवाइयाँ दो प्रकार की होती हैं, जेनेरिक और ब्रांडेड । आजकल हमारे देश में भी जेनेरिक दवाइयों को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन अब सवाल यह उठता है की दोनों में से कौन से प्रकार की दवाई हमारी बीमारी को दूर करने में ज्यादा असरकारक है। सरकार ने बहुत से जनौषधि केंद्र भी खुलवाएं हैं जहाँ जेनेरिक दवाइयाँ आसानी से और कम दामों में मिल जाती हैं और ब्रांडेड दवाइयाँ तो हर मेडिकल स्टोर पर आसानी से मिल जाती है।

अब सवाल यह है की जब दवाइयाँ दोनों हमें मिल ही जाती हैं तो ब्रांडेड दवाइयों का उपयोग इतनी अधिकता में क्यों किया जाता है, क्यों चिकित्सक (Doctors) भी ब्रांडेड दवाइयों का पर्चा (Prescription) ही मरीजों को थमाते हैं, जबकि सरकारी चिकित्सकों को जेनेरिक दवाइयों का नाम ही किसी मरीज को लिखने बोला गया है ,फिर भी क्यों ब्रांड की दवा ही चिकित्सक द्वारा लिखी जाती। चिकित्सकों (Doctors)का काम केवल मरीजों की जान बचाना है तो वह मरीजों को सबसे अच्छी दवा ही लिखना पसंद करते हैं, लेकिन क्या जेनेरिक दवाइयाँ, ब्रांडेड का विकल्प नहीं हो सकती हैं। हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, अच्छे बुरे दोनों अब ये हम पर ब्झि निर्भर करता है की हम उसे कैसे समझते हैं, और अगर आप मेडिकल फील्ड से हैं तो फिर तो आपको ये समझ काफी अच्छी होगी।

दवाइयों के निर्माण में महत्वपूर्ण चरण (Important stage in the manufacture of medicines)-

1.कच्चा पदार्थ (Raw material)-

जेनेरिक और ब्रांडेड दोनों दवाइयों को बनाने में कच्चे पदार्थ (Raw material)की आवश्यकता होती है, यह कच्चे पदार्थ हमें पौधों से (From plants) भी मिलते हैं साथ ही हम इन्हें अपनी लैबोरेटरी (Laboratory) में भी बना सकते हैं मतलब की हमें यह कृत्रिम (Synthetic) तरीके से भी प्राप्त हो सकता है। किसी भी दवाई के निर्माण में कच्चे पदार्थ (Raw material) की भूमिका काफी अहम होती है, यह बिल्कुल ऐसे ही जैसे अगर कच्ची सब्जी खराब तो हम उसकी सब्जी नहीं बनाते क्योंकि हमें पता की वह खराब ही बनेगी और हमारी सेहत के लिए भी खराब रहेगी, ठीक वैसे ही कच्चे पदार्थ (Raw material)की गुणवत्ता भी हमारे लिए महत्वपूर्ण है और इसकी दवाई बनाने से पहले इसका भी परीक्षण (Test) किया जाता है की यह आगे किसी प्रकार के फर्मास्यूटिकल डोसेज फॉर्म ( Pharmaceutical dosage form) के उपयुक्त (Suitable) है या नहीं। दूसरा दवाइयों के लिए किस ग्रेड (Grade) का कच्चा पदार्थ उपयोग में लाया जा रहा है यह भी जरूरी मतलब अगर हम कपड़ा लें तो उसमें भी कई वैरायटी (Variety) आती है, ठीक वैसे ही कच्चे पदार्थ में कई वैरायटी (Variety)आती है, इसलिए यह दवाई बनाने का प्रथम चरण है, और यहीं से दवाई के निर्माण की प्रक्रिया शुरू होती है।

2.दवाइयों के निर्माण में उपयोग में आने वाले पदार्थ (Substances used in the manufacture of medicines) –

दवाइयों के निर्माण में बहुत से पदार्थ उपयोग में लाये जाते हैं जो दवाइयों के भार (Weight), पाउडर की फ्लो प्रॉपर्टी (Flow property), दवाइयों के रंग (Color),
दवाइयों के शरीर में सही समय में टूटने (Disintegrate) और भी बहुत से गुण होते हैं जिनके लिए बहुत से एक्सिपिएंट(excipient)उपयोग में लाये जाते हैं , जैसे ग्लाइडेंट (Glidant), लुब्रिकेंट (Lubricant), डाइलुएंट (Diluent), स्वीटनर्स (sweeteners)और शुगर कोटिंग (Sugar coating), प्रेसरवेटिव्स (Preservatives) और भी बहुत सी चीजें उपयोग में लायी जाती हैं, जो दवाइयों को बहुत अच्छा बनाए और उसकी आयु मतलब सेल्फ लाइफ (Self life) भी लंबी रहे। यह सभी जेनेरिक और ब्रांडेड दोनों में उपयोग में आते हैं, लेकिन बात फिर वही गुणवत्ता की होती है।

3.उपकरण (Instrument) –

अब आपके पास उपकरण भी साफ -सुथरे होने चाहिए ना ही जंग लगी हुई ना ही किसी प्रकार के धूल के कण (Dust particles)होने चाहिए, साथ ही आप की दवाइयाँ जहां भी बन रही हों वहाँ किसी भी प्रकार के पानी वाले पाइप का निस्काषन (Outlet) बाहर ही होना चाहिए, चाहे वह वॉश बेशीन (Wash basin) क्यों ना हो। पानी की एक बूंद, या किसी के बाल, जानवर के फर यह सभी दवाइयों को खराब कर सकते हैं, तो इसके लिए एक असेप्टिक रूम (Aseptic room) होता है जहाँ आप अपने जूते के सोल (Shoe sole) से लेकर अपने बालों (Hairs) तक को ढँककर जाएंगे मतलब कवर करके ताकि आपके जूते की धूल (Dust particle)किसी भी प्रकार से अंदर ना जाए और ना ही आपके बाल बनने वाली दवाइयों में जाए। आपको जो काम करने का तरीका बताया गया है चरणबद्ध (Stepwise) तरीके से वही आपको करना है, मतलब की आपको दवाइयों के निर्माण में स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (Standard operating procedure) का अनुसरण (follow) करना होता है। तो आपका अपेस्प्टिक रूम, आप खुद और उपकरण तीनों साफ होने चाहिए।

4.गुणवत्ता की जाँच (Quality check) –

दवाइयों की गुणवत्ता में उसकी कठोरता मतलब हार्डनेस (Hardness), उसकी टूटने की क्षमता मतलब फ्राइबिलिटी (Friability) और पेट में जाकर छोटे-छोटे टुकड़े में टूटने की क्षमता मतलब डिसिंटीग्रेसन (Disintegration) और घुलने की क्षमता मतलब डिसोलियुसन (dissolution) यह सभी किसी भी दवाइयों की गुणवत्ता का सही-सही अनुमान लगाने के लिए कुछ परीक्षण (Test) हैं, जो आगे दवाइयों को बाजार में उतारने के लिए उपयोगी हैं।

5.नैदानिक ​​परीक्षण (Clinical trial) –

अब बात आती की जो दवाइयाँ इतनी मेहनत से बनाई गयी हैं, वह मनुष्य के शरीर पर कितना असर करेंगी, अब यह बात इस पर निर्भर (Depend) करेगी की दवाइयों में किस प्रकार के कच्चे पदार्थ (Raw material) उपयोग में लाये गए हैं, किस प्रकार उन्हें असेप्टिक रूम (Aseptic room) में बनाया गया है, कौन-कौन से परीक्षण उसके लिए अपनाएं गए हैं, ताकि वह मनुष्य के शरीर के अनुरूप उस पर अपना असर दिखाये। लेकिन इन सबके बाद बात आती है ,नैदानिक ​​परीक्षण (Clinical trial)की मतलब जो दवाई अब आपने बनाई है उसका जानवरों पर क्या प्रभाव है, अच्छा है या बुरा है, मतलब वह दवाई क्या असर दे रही है, कहीं कोई टोक्सिसिटी (toxicity) तो नहीं दे रही। अगर यह सब सही है तब जाकर आपको एफ.डी.ए. (FDA- Food drug administration)से एप्रूवल (Approval) लेना होगा ताकि आप इसे बाजार (Market)में उतार सकें।

अब आपको मैंने छोटे शब्दों में समझा दिया की दवाइयों के निर्माण में कितने चरण हैं, इन्हीं चरणों (steps) से दवाइयों की गुणवत्ता निर्धारित कर उसे बाजार में ब्रांडेड और जेनेरिक का नाम दिया जाता है।

जेनेरिक और ब्रांडेड दवाइयों दोनों के निर्माण में समान रूप से चीजों की आवश्यकता होती है चाहे वह कोई पदार्थ हो या फिर किसी प्रकार की मशीन लेकिन देखते हैं की ऐसे कौन से तथ्य हैं जो दोनों दवाइयों को एक- दूसरे से अलग बनाती हैं।

जेनेरिक या ब्रांडेड दवाइयों में अंतर (Difference between generic or branded medicines)-

1.मूल्य में अंतर (Price difference) –

जेनरिक दवाइयाँ , ब्रांडेड दवाइयों की तुलना में काफी सस्ती आती हैं, जैसे आप देखेंगे की आपको ब्रांडेड में 10 से 15 प्रतिशत छूट (Discount) मिलती है वहीं ब्रांडेड का मूल्य काफी अधिक होता है , जेनरिक दवाइयों में लगभाग 50-65 प्रतिशत तक की छूट मिल जाती है। और यह अंतर इसलिए है क्योंकि ब्रांडेड का पैटेंट (Patent) खत्म होने के बाद जेनेरिक दवाइयाँ बनाई जाती हैं।

2.केमिकल फॉर्मूला और मॉलिक्यूल (Chemical formula and molecule) –

दोनों ही दवाइयों में केमिकल और मॉलिक्यूल फॉर्मूला समान (same) होते हैं लेकिन जेनरिक दवाइयाँ आपको सम्मिश्र्ण (Combination) में नहीं मिलेंगी लेकिन ब्रांडेड दवाइयों में आपको आसानी से कई दवाइयों का सम्मिश्र्ण (Combination) मिल जाता है , साथ ही इसमें कई प्रकार के एक्सिपिएंट(excipient)भी मिलाये जाते हैं, लेकिन जेनेरिक में एक्सिपिएंट (excipient)बहुत सारे नहीं होते हैं।

3.बड़ा ब्रांड ना होना (not being a big brand)-

जेनेरिक दवाइयों का ब्रांड बड़ा नहीं होता इसे सीमित संसाधनों में बनाया जाता है, जिसकी वजह से ना इसका कोई प्रचार-प्रसार होता है, ना ही इसकी कोई एडवरटाइसमेंट (Advertisement) की जाती है , वही ब्रांडेड दवाइयों का बहुत उच्च स्तर पर प्रचार-प्रसार होता है, बड़े स्तर पर इसका निर्माण किया जाता है, हर स्तर पर इसके एसओपी (SoP- Standard operating procedure) का ध्यान रखा जाता है, इसलिए यह दवाइयाँ महँगी भी होती हैं लेकिन साथ ही किसी प्रकार की गलती की गुंजाइश भी कम होती है क्योंकि हर मानक का पालन पूरी तरह किया जाता, इस वजह से इसका मूल्य भी ज्यादा होता है।

4.जेनेरिक और ब्रांडेड में प्रभावी कौन (Who is effective in generic and branded)-

जेनेरिक और ब्रांडेड दोनों ही मनुष्य के शरीर पर प्रभावी होते हैं क्योंकि दोनों के साल्ट या सक्रिय संघटक (active ingredient) समान ही होते हैं जिनका फॉर्मूला भी एक ही होता है , इसलिए दोनों ही समान रूप से प्रभावी होते हैं लेकिन अब यह इस बात पर भी निर्भर करता है की दवाइयों को बनाते समय किस मानक का पालन किया गया है, किस स्थिति में बनाया गया है, बहुत से चीजें जो हमने असेप्टिक रूम (Aseptic room) में देखी हैं, यह भी एसओपी (SoP- Standard operating procedure) के अंतर्गत ही आता है तो इसका पालन करना आवश्यक है।

5.दवाइयों का नामकरण (Nomenclature of medicines)-

ब्रांडेड दवाइयों का नामकरण उस इंडस्ट्री या कंपनी (Industry or company) के नाम पर होता है जिस दवाई का निर्माण वह करती है, वही जेनेरिक दवाइयों का नामकरण उनके सक्रिय संघटक (active ingredient)के नाम पर होती है।

6.नैदानिक ​​परीक्षण और पेटेंट (Clinical trial and patent) –

किसी भी दवा को अपने एक विशेष नाम से बनाने के लिए और उसे बेचने के लिए , साथ ही ठीक उसी नाम से कोई उस दवाई को ना बना सके उसके लिए कंपनी द्वारा पेटेंट लिया जाता है , यह लगभग 10 से 15 साल के लिए भी हो सकता है, जब तक इसकी मान्यता (Validity)होती है तब तक वही कंपनी उस दवाई का निर्माण कर सकती है जिसका पेटेंट है, पेटेंट की मान्यता खत्म होते ही उसी फॉर्मूले को लेकर समान नाम से ही या मिलते जुलते नाम से जेनेरिक दवाई बनाई जाती है, मतलब की जेनेरिक दवाई पेटेंट के खत्म होने पर बनती हैं लेकिन ब्रांडेड बिना पेटेंट के नहीं बनाई जा सकती हैं। और यह पेटेंट उस कंपनी को तभी दिया जाता है जब उस दवाई का अच्छे से परीक्षण हुआ हो , उस दवाई के प्रभाव और कुप्रभाव (Effects and side effects) दोनों का अध्ययन अच्छे से किया गया हो, उसका परीक्षण जानवरों पर भी किया गया हो जिसे हम नैदानिक ​​परीक्षण (Clinical trial)भी कहते हों किया गया हो, इन सब के बाद ही किसी कंपनी को इसका अधिकार प्राप्त होता है की वह यह दवाई बना सके। और जेनेरिक दवाइयाँ इस पेटेंट के ऑफ (Off) होने पर ही बनाई जाती है। जेनेरिक दवाइयों में नैदानिक ​​परीक्षण (Clinical trial) आवश्यक नहीं है लेकिन ब्रांडेड में अतिआवश्यक है।

7.दवाइयों की बनावट (Texture of medicines) –

ब्रांडेड दवाइयों का रंग (Color), आकार (Shape) और साइज (Size) कंपनी के नाम की तरह ही अद्वितीय (Unique) होते हैं, इनकी टैबलेट की ही बात लें तो यह बहुत चिकने (Smooth), रंग में अच्छे और अच्छी परिष्करण (Finishing) लिए हुए होते हैं, लेकिन जेनेरिक दवाइयों के साथ ऐसा नहीं होता कई बार यह पैकिंग में ही टूट जाते हैं या टैबलेट की किनारे भी खराब हो जाते हैं, क्योंकि सीमित संसाधनों की वजह से इसकी कठोरता और पैकेजिंग पर अच्छे से ध्यान कंपनी द्वारा नहीं दे पाते बनता है।

8.जेनेरिक और ब्रांडेड के उदाहरण (Examples of generic and branded) –

एक ही साल्ट या सक्रिय संघटक (active ingredient)की ब्रांडेड दवाइयाँ कई नामों से आ सकती हैं लेकिन जेनेरिक में साल्ट के नाम से ही दवाई आती है पर कंपनी कोई भी हो सकती है। मतलब अगर हम पैरासेटामॉल की बात करें तो यह एक सक्रिय संघटक (active ingredient)हैं, यह ब्रांडेड में क्रोसिन, डोलो, पैरासेफ कई नामों से कई ब्रांड की दवाई आती है, लेकिन यहीं हम अगर जेनेरिक की बात करें तो यह पैरासेटामॉल के नाम से ही मार्केट में आएगी चाहे इसे कोई भी कंपनी बना ले।

अब आप समझ ही गए होंगे की जेनेरिक और ब्रांडेड दवाइयाँ किन बिन्दुओं पर एक- दूसरे से भिन्न (Different) हैं, तो बाकी अब यह दवाई लिखने वाले चिकित्सक पर निर्भर करता है की उसे मरीज को क्या लिखना है, सरकार के नियमानुसार सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों को जेनेरिक दवा ही लिखने के लिए नियम बनाया गया है, और निजी अस्पताल के चिकित्सक ब्रांडेड या जेनेरिक दोनों ही लिख सकते हैं।

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